भूख तन की भी बढ़ी
भूख मन की भी बढ़ी
धार कर विकराल रूप
बन समस्या है खड़ी
है ज़रूरत बशर की
कहने को दो रोटियां
क्यूं उतारू हो गया है
काटने को बोटियाँ
खनक सिक्कों की उसे
बेचैन करती रात दिन
काटता हर पहर वह
यूं तो हर पल को गिन
ललक उठ रही है
छूने को आसमां
पाँव इक दूजे पे रख
चल रहा हर शख़्स यहां
लग रही है आज बोली
ईमां और विवेक की
उठ गई है अब तो अर्थी
सत्य और परिवेश की
आचार सदाचार का
भेद सारा खो गया
कहने को तो है बहुत
पर दामन खाली हो गया
हवस का लिबास ओढे
घूमता हर नौजवां
नही सुरक्षित रह गई
आज बहु बेटियां
मांगते हैं सड़क पे
ले कटोरा हाथ में
वह भरे भंडार जिनके
हैं खड़े कतार में |
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