Sunday, 21 September 2014

भूख तन की भी बढ़ी 
भूख मन की भी बढ़ी 
धार कर विकराल रूप
बन समस्या है खड़ी 
है ज़रूरत बशर की 
कहने को दो रोटियां 
क्यूं उतारू हो गया है
काटने को बोटियाँ 
खनक सिक्कों की उसे 
बेचैन करती रात दिन 
काटता हर पहर वह 
यूं तो हर पल को गिन 
ललक उठ रही है
छूने को आसमां 
पाँव इक दूजे पे रख 
चल रहा हर शख़्स यहां 
लग रही है आज बोली
ईमां और विवेक की 
उठ गई है अब तो अर्थी 
सत्य और परिवेश की 
आचार सदाचार का 
भेद सारा खो गया 
कहने को तो है बहुत 
पर दामन खाली हो गया 
हवस का लिबास ओढे 
घूमता हर नौजवां 
नही सुरक्षित रह गई 
आज बहु बेटियां 
मांगते हैं सड़क पे 
ले कटोरा हाथ में 
वह भरे भंडार जिनके 
हैं खड़े कतार में | 

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